अंतरजातीय विवाह:- प्रारम्भ से आज तक सही या गलत?

यदि मैं कहूं उन भागवत गीता अंतर जाति विवाह का समर्थन करती है।

कुछ लोग मेरे बात का मजाक उड़ाएंगे कुछ लोग मुझे पागल है कहेंगे।परन्तु यह बात मैं पूर्ण रूपेण अपने अध्ययन और ज्ञान के आधार पर लिख रहा हूं और आगे इसके प्रमाण देते जाऊंगा।

भागवत गीता से प्रमाण:-

चातुर-वर्न्यम माया स्र्स्तम गुना-कर्मा-विभागासः


तस्य कर्तारं अपि मम विद्धि अकर्तारं अव्ययम”


यह गीता में भगवान कृष्ण द्वारा रचित एक कथन है जिसके द्वारा वह कहते हैं कि चार वर्णों यानी कि ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र की रचना उन्होंने गुण और कर्म के आधार पर की है । यहां पर उन्होंने कहीं भी कुल का नाम नहीं लिया अर्थात नीच कर्म करने वाला शुद्र गिना जाएगा और इसी प्रकार अपेक्षाकृत अच्छे कर्म करने वाले क्रमशः वैश्य क्षत्रिय और ब्राह्मण गिने जाएंगे। उदाहरण के लिए नीच कर्म करने वाले शुद्र माता पिता से उत्पन्न संतान यदि भगवत भजन तथा भगवान संबंधी कार्यों में लीन रहता है तो वह ब्राह्मण होगा और यदि ब्राह्मण माता पिता से उत्पन्न संतान मांस मदिरा सेवन का वेश्यावृत्ति करता है तो वह शूद्र होगा।

गीता में यह कहीं नहीं कहा गया है कि ब्राह्मण को ब्राह्मण से विवाह क्षत्रिय क्षत्रिय से विवाह या शुद्र को शूद्र से विवाह करना चाहिए। क्योंकि व्यक्ति ब्राम्हण क्षत्रिय शूद्र या वैश्य अपने कर्मों से निर्धारित होगा।

अर्थात गीता में कहीं भी अंतर जाति विवाह ना करने का उल्लेख नहीं है स्पष्टतः अंतर जाति विवाह प्रतिबंधित नही है।

एक अन्य मिथक जो लोगों के द्वारा फैलाया जाता है वह है अंतर जाति विवाह से वर्णसंकर की उत्पत्ति का झूठ। इसके लिए गीता में यह श्लोक है

अधर्मभिभावत कृष्णा प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः

स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेयॊ जयते वर्नासंकारह

यहाँ स्पष्ट कहा गया है कि वर्ण संकर की उत्पत्ति कुल में पाप के बढ़ जाने से होती है ना कि अंतर जाति विवाह से। कुल में पाप बढ़ जाने से स्त्रिया दूषित हो जाती है तथा उसे वर्णसंकर उत्पन्न होते हैं जो कुल के नाशक वह अत्यंत नीच कर्म करने वाले होते हैं।

यहाँ भी अंतर्जातीय विवाह के विरुद्ध दिया जाने वाला एक तर्क जड़ से खारिज हो जाता है की अंतर जाति विवाह से वर्णसंकर उत्पन्न होते हैं।

ऋग्वेद से प्रमाण:-

अब बात यदि उत्तर वैदिक काल की करें तो तब दो प्रकार की विवाह पद्धति या थी एक था श्रेष्ठ विवाह पद्धति और दूसरी निम्न विवाहपद्धति। श्रेष्ठ विवाह पद्धति में चार प्रकार के विवाह थे ब्रह्म विवाह ,आर्ष विवाह ,दैव विवाह, प्रजापत्य विवाह। प्रजापत्य विवाह परिवार की आपसी रजामंदी से होता था इसमें जाति बंधन नहीं था अर्थात दो किसी भी को लोगों के आपसी रजामंदी से वर वधु का विवाह संपन्न होगा। यह पद्धति विवाह की श्रेष्ठ पद्धति में आए जोकि बताता है उत्तर वैदिक काल में अंतर जाति विवाह को समाज में विशिष्ट स्थान प्राप्त था। निम्न विवाह पद्धति में गंधर्व विवाह का उल्लेख है जिसमें वर वधू की आपसी सहमति से विवाह होता है यह भी विवाह की एक निम्न पद्धति थी जो उस काल में अंतर जाति विवाह की स्वीकार्यता को दर्शाती है।

इसके अलावा अनुलोम विवाह में उच्च कुलीन वर्ग का विवाह निम्न कुलीन वधू से होता था तथा प्रतिलोम विवाह में निम्न कुलीन वर्ग का विवाह उच्च कुलीन वधू से होता था। यहां भी अंतर जाति विवाह की स्वीकार्यता आप आसानी से देख सकते हैं।

बाद मे व्यक्तियों ने अपने स्वार्थ के हिसाब से इन नीतियों को भ्रष्ट कर दिया जाति व्यवस्था को जन्म दिया तथा इसे कर्म आधारित ना रहकर जन्म आधारित बना दिया। तब से यह रीति कुरीति बन गई और बाद में स्त्रियों की स्थिति भी गिर गई क्योंकि बाद में राजा पुरोहितों आदि का शक्ति बढ़ गई और वह कदापि नहीं चाहते थे कि उनके घर की स्त्रियां स्त्रियों का विवाह नीचे कहीं जाने वाले वर्णों के लोगों से हो।

यदि आप सोचते है कि अंतर जाति विवाह कर रहे हैं तो धर्म के अनुसार गलत कर रहे हैं। आप निश्चिंत हो जाइए क्योकि आप कुछ गलत नही कर रहे।

आधुनिक परिप्रेक्ष्य में:- अब बात आधुनिक परिपेक्ष में करते हैं यदि आपको और आपके साथी में यह भाव है कि आप दोनों अपना जीवन साथ में व्यतीत करना चाहते हैं और इसमें दोनों के माता-पिता ओं की इच्छा भी शामिल हो तो इसमें कोई भी गलत बात नहीं है।पर यह सुनिश्चित करले की आप और आपके साथी एक दूसरे के प्रति क्या भाव रखते हैं आपस में समय व्यतीत कर एक दूसरे को समझे और रिश्ते को प्रगाढ़ होने दे तत्पश्चात अपने आगे के जीवन के बारे में सोचें यहां पर दोनों का भविष्य भी सुरक्षित रहना आवश्यक है।

उपयुक्त उत्तर मैंने किताबों से अपने निरीक्षण तथा अध्ययन के आधार पर लिखा है यदि से किसी के विचार मेल नहीं खाते हैं तो मैं उसके लिए क्षमा चाहूंगा क्योंकि वेदों को देखने की दृष्टि सब की एक समान नहीं हो सकती।

धन्यवाद,

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